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बालकाण्ड
वाल्मीकि रामायण Valmiki Ramayan
सुन्दरकाण्ड

रावण के दरबार में
ब्रह्मास्त्र से बँधे हुये हनुमान रावण के भव्य दरबार को विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखने लगे। वे उसके अद्भुत ऐश्वर्य की सराहना किये बिना न रह सके। वे सोचने लगे, इस भव्य ऐश्चर्य का स्वामी रावण यदि शुद्ध आचरण का भी स्वामी होता तो वास्तव में यह तीनों लोकों का राजा हो瓥344;े के योग्य था, किन्तु इसने अपने दुराचरण से स्वयं को सबकी दृष्टि से गिरा दिया। वे सब कुछ निःशंक दृष्टि से देखते रहे। अपने सम्मुख हनुमान को इस प्रकार निर्भय खड़ा देख कर तथा अपने प्रिय पुत्र की मृत्यु की बात स्मरण करके रावण क्रुद्ध होकर अपने महामन्त्री प्रहस्त से बोला, "हे मन्त्रिवर! इस वानर से पूछो, यह कहाँ से आया है? किसने भेजा है? और यह सीता से क्यों वार्तालाप कर रहा था? इससे यह भी पूछो कि प्रजा की भलाई और मनोरंजन के लिये बनाई गई अशोकवाटिका को इसने क्यों नष्ट किया? इसके अतिरिक्त मेरे वीर सैनिकों का इसने वध क्यों किया है?"
रावण की आज्ञा पाकर प्रहस्त ने कहा, "हे वानर! यद्यपि तुमने बड़े भयं瓥5;र अपराध किये हैं, जिन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता, परन्तु यदि तुम हमें सच-सच बता दो कि तुम कौन हो और तुमने ऐसा क्यों किया है तो हम तुम्हें क्षमा कर सकते हैं। वैसे तुम्हारा अपराध मृत्यदण्ड के योग्य है, फिर भी मैं तुम्हें अभय देता हूँ। तुम बिना छिपाये सारी बातें हमें स्पष्ट बता दो।"
मन्त्री के कथन को सुन कर पवनपुत्र हनुमान निर्भय होकर रावण से बोले, "हे राक्षसराज! मुझे किसी बात को छिपाने की आवश्यकता नहीं है और न मैं कभी मिथ्या भाषण करता हूँ। मैं किष्किन्धा के परम पराक्रमी नरेश सुग्रीव का दूत हूँ। उन्हीं की आज्ञा से तुम्हारे पास आया हूँ। हमारे महाराज ने तुम्हारा कुशल समाचार पूछा है और कहा है कि तुमने नीतिवान तथा धर्म एवं चारों वेदों के ज्ञाता होते होते हुये भी एक परस्त्री को बलात् अपने यहाँ रोक रखा है, यह 瓥0;ुम्हारे लिये महान कलंक की बात है। तुमने यह दुष्कर्म करके अपनी मृत्यु का आह्वान किया है। उन्होंने यह भी कहा है कि लक्ष्मण के कराल बाणों के सम्मुख बड़े से बड़ा पराक्रमी भी नहीं ठहर सकता, फिर तुम उससे अपने प्राणों की रक्षा कैसे कर सकोगे? इसलिये तुम्हारे लिये उचित होगा कि तुम सीता को श्री रामचन्द्र जी को लौटा दो और उनसे क्षमा माँग लो। यदि तुम ऐसा न करोगे तो तुम्हारा अन्त भी वही होगा जो खर-दूषण और बालि का हुआ है।"
हनुमान के ये नीतियुक्त वचन सुनकर रावण का सर्वांग क्रोध से जल उठा। वह बोला, "हे वानर! तेरे जैसे मूर्ख तथा बुद्धिहीन वानर को अपना दूत बना कर सुग्रीव ने अपनी अल्प बुद्धि का परिचय दिया है। सम्भवतः तुझे और तेरे स्वामी सुग्रीव को मेरी शक्ति का अनु瓥350;ान नहीं है। मैंने समस्त देवों, दानवों एवं मनुष्यों को परास्त करके सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपनी हथेली पर उठाया है। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो मेरा अपमान करके जीवित बचा हो। इसलिये पहले तुझे और फिर सुग्रीव सहित राम-लक्ष्मण को यमलोक भेजूँगा।" यह कह कर उसने अपने मन्त्रियों को आदेश दिया, "तुम लोग अभी इस दुष्ट के टुकड़े-टुकड़े कर डालो।"
रावण के वचन सुन कर उसके भाई विभीषण ने विनीत स्वर में कहा, "हे लंकापति! जब यह वानर स्वयं को दूत बताता है तो नीति तथा धर्म के अनुसार इसका वध करना अनुचित होगा क्योंकि दूत दूसरों का दिया हुआ संदेश सुनाता है। वह जो कुछ कहता है, वह उसकी अपनी बात नहीं होती, इसलिये वह अवध्य होता है।" विभीषण की बात पर विचार करने के पश्चात् रावण ने कहा, "तुम्हारा यह कथन सत्य है कि दूत अवध्य होता है, परन्तु इसने अ瓥8;ोकवाटिका का विध्वंस किया है इसलिये इसे दण्ड अवश्य मिलना चाहिये। मैं आज्ञा देता हूँ कि इसकी पूँछ को रुई और तेल लगा कर जला दी जाय ताकि इसे बिना पूँछ का देख कर लोग इसका उपहास करें और यह जीवन भर अपने कर्मों पर पश्चाताप करता रहे।"
रावण की आज्ञा पाते ही राक्षसों ने हनुमान की पूँछ को रुई और पुराने कपड़ों से लपेट कर उस पर बहुत सा तेल डाल कर आग लगा दी। अपनी पूँछ को जलते देख हनुमान को बहुत क्रोध आया। सबसे पहले तो उन्होंने रुई लपेटने और आग लगाने वाले राक्षसों को जलती पूँछ से मार-मार कर पृथ्वी पर सुला दिया। वे जलते चीखते-चिल्लाते वहाँ से अपने प्राण लेकर भागे। कुछ राक्षस उनका अपमान करने के लिये उन्हें बाजारों में घुमाने के लिये ले चले। उस दृष्य को देखने के लिये बाजारों में राक्षसों की और घरों के छज्जों तथा खिड़कियों 瓥46;र स्त्रियों की भीड़ जमा हो गई। मूर्ख राक्षस उन्हें अपमानित करने के लिये उन पर कंकड़-पत्थर फेंकने तथ अपशब्द कहने लगे। इस अपमान से क्रुद्ध होकर स्वाभिमानी पवनसुत एक ही झटके से सारे बन्धनों को तोड़ कर नगर के ऊँचे फाटक पर चढ़ गये और लोहे का एक बड़ा सा चक्का उठा कर अपमान करने वाले राक्षसों पर टूट पड़े। इससे चारों ओर भगदड़ मच गई।
आगे की कथा - लंका दहन
Valmiki Ramayn is a great Hindu epic created by Maharshi Valmiki in Sanskrit language. Maharshi Valmiki describes the holly character or Lord Rama in Valmiki Ramayan. Lord Rama is treated as a person by Manarshi Valmiki where as in the epic Ramcharitmanas Saint Tulsidas treats him as an incarnation of Lord Vishnu.
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