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बालकाण्ड
वाल्मीकि रामायण Valmiki Ramayan
किष्किन्धाकाण्ड

हनुमान को मुद्रिका देना
वानर यूथपतियों को इस प्रकार की कठोर आज्ञा दे कर सुग्रीव हनुमान से बोला, "हे कपिश्रेष्ठ! मैं जानता हूँ कि आकाश, पाताल, भूतल, अन्तरिक्ष, वन, पर्वत, सागर कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ तुम्हारी गति न हो। तुम सब स्थानों को जानते हो और तुम अतुल, अद्वितीय, पराक्रमी तथा ì瓥;ाहसी भी हो। इसके अतिरिक्त अपूर्व सूझबूझ वाले नीति एवं कार्यकुशल भी हो। वैसे मैंने सीता जी की खोज के लिये सब वानरों को आदेश दिया है परन्तु मुझे सच्चा भरोसा तुम्हारे ऊपर ही है और तुम्हें ही उनका पता लगा कर लाना है।"
सुग्रीव का हनुमान पर इतना भरोसा देख कर राम बोले, "हे हनुमान! सुग्रीव की भाँति मुझे भी तुम पर विश्वास है कि तुम सीता का पता अवश्य लगा लोगे। इसलिये मैं तुम्हें अपनी यह मुद्रिका देता हूँ जिस पर मेरा नाम अंकित है। जब कभी जानकी मिले, उसे तुम यह मुद्रिका दे देना। इसे पा कर वह तुम्हारे ऊपर सन्देह नहीं करेगी। तुम्हें मेरा दूत समझ कर सारी बातें बता देगी।
राम की मुद्रिका ले कर ह瓥44;ुमान ने उसे अपने मस्तक से लगाया और सुग्रीव तथा श्री राम के चरणों को स्पर्श कर के वानरों की सेना के साथ सीता को खोजने के लिये निकल पड़े। शेष वानर भी सुग्रीव के निर्देशानुसार भिन्न-भिन्न दिशाओं के लिये चल पड़े। उन्होंने वनों, पर्वतों, गिरिकन्दराओं, घाटियों, ऋषि-मुनियों के आश्रमों, विभिन्न राजाओं की राजधानियों, शैल-शिखरों, सागर द्वीपों, राक्षसों, यक्षों, किन्नरों के आवासों आदि को छान मारा परन्तु कहीं भी उन्हें जनकनन्दिनी सीता का पता नहीं मिला। अन्त में भूख-प्यास से व्यथित हो थक कर उत्साहहीन हो निराशा के साथ एक स्थान पर बैठ कर अपने कार्यक्रम के विषय में विचार विमर्श करने लगे। एक यूथपति ने उन्हें सम्बोधित करते हुये कहा, "हमने उत्तर पूर्व और पश्चिम दिशा का कोई स्थान नहीं छोड़ा। अत्यन्त अगम्य प्रतीत होने वा瓥#2354;े स्थानों को भी हमने छान मारा किन्तु कहीं भी महारानी सीता का पता नहीं चला। मेरे विचार से अब हमें दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करना चाहिये। इसलिये अब अधिक समय नष्ट न कर के हमें तत्काल चल देना चाहिये।"
यूथपति का प्रस्ताव स्वीकार कर सबसे पहले यह दल विन्ध्याचल पर पहुँचा। वहाँ का कोना कोना छान कर बढ़ते हुये वे समुद्र तट पर जा पहुचे। वहाँ वे निराश हो कर बोले, "सीता जी को खोज पाने में हम लोग सर्वथा निष्फल रहे हैं। अब हम लौट कर राजा सुग्रीव और रामचनद्र जी को कैसे मुख दिखायेंगे। निष्फल हो कर लौटने से तो अच्छा है कि हम यहाँ अपने प्राण त्याग दें।"
उनकी निराशा भरी बातें वहीं निवास करने वाला एक गृद्ध सुन रहा था। वह उनके सम्मुख आकर बोला, "भाइयों! तुम सीता जी की &瓥2326;ोज करने जा रहे हो। मैं इस विषय में तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ। मेरा एक भाई जटायु था जो रावण से लड़ कर मारा गया था। उस समय रावण सीता जी का हरण कर के ले जा रहा था और जटायु उसे बचाना चाहता था। वैसे मेरी इच्छा थी कि रावण का वध मैं स्वयं करूँ क्योंकि उसने मेरे भाई की हत्या की थी, परन्तु मैं वृद्ध और दुर्बल होने के कारण उससे प्रतिशोध नहीं ले सकता। इसलिये मैं तुम्हें उसका पता बताता हूँ। सीता जी का हरण करने वाला रावण लंका का राजा है और उसने सीता जी को लंकापुरी में ही रखा है जो यहाँ से चार सौ कोस की दूरी पर है और इस समुद्र के उस पार है। लंकापुरी में बड़े भयंकर, सुभट, पराक्रमी राक्षस रहते हैं। लंकापुरी एक पर्वत के ऊपर स्वर्ण निर्मित नगरी है जिसका निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया है। उसमें बड़ी सुन्दर ऊँची-ऊँची मनोरम स्वर瓥1;ण निर्मित अट्टालिकाएँ हैं। वहीं पर स्वर्णकोट से घिरी अशोकवाटिका है जिसमें रावण ने सीता को राक्षसनियों के पहरे में छिपा कर रखा है। इस समुद्र को पार करने का उपाय करो तभी तुम सीता तक पहुँच सकोगे।" यह कह कर वह गृद्ध मौन हो गया।
आगे की कथा - जाम्बवन्त के द्वारा हनुमान को प्रेरणा
Valmiki Ramayn is a great Hindu epic created by Maharshi Valmiki in Sanskrit language. Maharshi Valmiki describes the holly character or Lord Rama in Valmiki Ramayan. Lord Rama is treated as a person by Manarshi Valmiki where as in the epic Ramcharitmanas Saint Tulsidas treats him as an incarnation of Lord Vishnu.
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