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बालकाण्ड
वाल्मीकि रामायण Valmiki Ramayan
अरण्यकाण्ड

रावण को शूर्पणखा का धिक्कार
रावण के मारीच के पास से लंका लौटने के कुछ काल पश्चात् शूर्पणखा वहाँ आ पहिँची। उसने देखा, रावण चारों ओर से मन्त्रियों से घिरा हुआ स्वर्ण के सिंहासन पर बैठा ऐसी शोभा पार रहा था जैसे स्वर्ण की वेदी में घी प्रज्वलित अग्नि। जिसने समुद्रों तथा पर्वतों पर विजय प्राप्त की है, नागराज वा瓥0;ुकि को परास्त कर तक्षक की प्रिय पत्नी का हरण किया है, कुबेर को जीत कर उससे पुष्पक विमान छीना है, इन्द्रादि देवता जिससे भयभीत रहते हैं, वायु देवता जिस पर पंखा डुलाते हैं, वरुण जिसके यहाँ पानी भरता है और जो मृत्यु को भी परास्त करने की सामर्थ्य रखता है, ऐसे परमप्रतापी भाई की बहन होकर मैं नाक-कान कटवा कर अपमान का विष पियूँ, धिक्कार है ऐसी वीरता और पराक्रम पर। यह सोचते हुये उसका सम्पूर्ण शरीर क्रोध और अपमान की ज्वाला ले जलने लगा। वह रावण के पास आ कर क्रोध से फुँफकारती हुई बोली, "धिक्कार है तुम पर, तुम्हारे शौर्य पर और तुम्हारे इन मन्त्रियों पर। तुम संसार से इतने अनजान होकर अपनी विलासिता में डूबे हुये हो कि तुम्हें यह भी पता नहीं कि तुम्हारी ओर तुम्हारा काल बढ़ा चला आ रहा है। हे नीतिवान रावण! क्या मुझे तुमको यह बता瓥344;े की आवश्यकता है कि समय पर उचित कार्य न करने वाले और अपने देश की रक्षा के प्रति असावधा रहने वाले राजा का राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जिस राजा के गुप्तचर सक्रिय और सतर्क नहीं होते, वह वास्तव में राज्य करने योग्य नहीं होता। क्योंकि गुप्तचर ही उसके नेत्र होते हैं। उनके बिना वह अंधा होता हे। मैं देख रही हूँ कि तुम्हारे गुप्तचर मूर्ख, अयोग्य और आलसी हैं। मन्त्री भी सर्वथा अयोग्य हैं जो उन्हें अभी तक यह पता नहीं कि उनके राज्य दण्डकारण्य में कितनी भयंकर घटना घट चुकी है। चौदह सहस्त्र राक्षसों का मेरे वीर भ्राताओं खर-दूषण सहित संहार हो चुका है। तुम्हारी बहन के नाक-कान एक विदेशी ने काट लिये हैं। परन्तु सुरा और सुन्दरियों में व्यस्त रहने वाले तुम्हें और तुम्हारे मन्त्रियों को इस सबकी क्या चिन्ता है? जो ऋë瓥;ि-मुनि कल तुम्हारे नाम से थर-थर काँपते थे वे आज सिर उठा कर निर्भय हो घूम रहे हैं। तुम्हें अब भी सोचना चाहिये कि वृक्ष से गिरे हुये पत्ते और राज्य से च्युत राजा का कोई मूल्य नहीं होता। जो राजा आँखों से सोता और नीति से जागता है, जिसका क्रोध प्रलयंकर और प्रसन्नता सुखदायिनी है, प्रजा उसी की पूजा करती है। किन्तु तुम में तो एक भी गुण नहीं है जो तुम राम द्वारा किये गये भीषण हत्याकाण्ड से अभी तक अपरिचित हो।"
शूर्पणखा के कटु वाक्य सुन कर रावण लज्जित होते हुये बोला, "मैं सब जानता हूँ शूर्पणखे! केवल तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। अब तुम राम और लक्ष्मण को मरा हुआ ही समझो। तेरे नाक-कान काटने वाले 瓥25;ो अब कोई बचा नहीं सकता। मैंने भली-भाँति विचार कर लिया है कि मुझे क्या करना है। राम मेरे हाथों मारा जायेगा। सीता मेरे महलों की शोभा बढ़ायेगी और तेरी दासी बन कर रहेगी।"
इतना कह कर रावण ने मन्त्रियों को विदा किया और फिर आकाश मार्ग से मारीच के पास पहुँचा। उससे स्नेह दिखाता हुआ बोला, "मित्र मारीच! मित्र ही संकट के समय मित्र की सहायता करता है। मैं जानता हूँ कि मेरे मित्रों और शुभचिन्तकों में तुमसे बढ़ कर बलवान, नीतिवान और मुझसे सच्चा स्नेह करने वाला और कोई नहीं है। मुझे बहन शूर्पणखा की दशा देख कर बहुत दुःख हुआ है। उन दुष्टों ने यह भी नहीं सोचा कि एक स्त्री पर हाथ नहीं उठाना चाहिये। उन कायरों को अवश्य दण्ड देना होगा। यह नाक शूर्पणखा की नहीं, सम्पूर्ण राक्षस जाति की कटी। हमारे नामे से काँपने वाले ऋषि-मुनि आज हमार&瓥2368; कायरता पर हँसते हैं। इस अपमान से तो मर जाना ही अच्छा है। भाई मारीच! उठो और सम्पूर्ण राक्षस जाति की इस अपमान से रक्षा करो। मैं सीता का हरण अवश्य करूँगा। तुम नाना प्रकार के वेश धारण करने में अद्वितीय हो। मैं चाहता हूँ कि तुम चाँदी के बिन्दुओं वाला स्वर्णमृग बन कर राम के आश्रम के सानमे जाओ। तुम्हें देख कर सीता अवश्य राम-लक्ष्मण को तुम्हें पकड़ने के लिये भेजेगी। उन दोनों के चले जाने पर मैं अकेली सीता का अपहरण कर के ले जाउँगा। राम को सीता का वियोग असह्य होगा और विरही राम को मार डालना मेरे लिये कठिन नहीं होगा।"
रावण के प्रस्ताव से अपनी असहमति प्रकट करते हुये मारीच बोला, "हे लंकापति! मैं पहले भी तुमसे कह चुका हूँ कि ऐसा करना तुम्हारे लिये उचित नहीं हो瓥गा। यह कार्य तुम्हारे जीवन के लिये काल बन जायेगा। सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि वेद-शास्त्रों के ज्ञाता होते हुये भी तुम परस्त्री हरण जैसा भयंकर पाप करने जा रहे हो। स्मरण रखो, राम के क्रोध से तुम बच नहीं सकोगे।"
मारीच के उत्तर से कुपित हो हाथ में खड्ग ले कर रावण बोला, "मारीच! मैं तुझे अपना मित्र समझ कर तेरे पास आया था। तेरा अनर्गल प्रलाप सुनने के लिये नहीं। तेरी कायरतापूर्ण युक्तियों को सुन कर मैं अपना विचार नहीं बदल सकता। सीता का हरण मुझे अवश्य करना है और तुझे मेरे आज्ञा का पालन करना है। यदि तू मेरी आज्ञा मान कर मेरे इस कार्य में सहायता नहीं करेगा तो राम-लक्ष्मण से पहले मैं तेरा वध करूँगा।"
रावण के इन क्रुद्ध शब्दों से भयभीत हो मारीच ने अपनी सहमति दे दी। इससे प्रसन्न हो कर रावण बोला, "अब तू सच्चा राक&瓥2381;षस है और मेरे परम मित्र है।" इसके पश्चात् रावण उसे ले कर दण्डक वन में पहुँच राम के आश्रम की खोज करने लगा। जब आश्रम मिल गया तो मारीच ने रावण के निर्देशानुसा मृग का रूप धारण किया और आश्रम के निकट विचरण करने लगा। इस अद्भुत स्वर्णिम मृग की शोभा देख कर सीता आश्चर्यचकित रह गई और विस्मित हो कर उसके पास पहुँची। मायावी मारीच ने अपनी मृग-सुलभ क्रीड़ाओं से सीता का मन मुग्ध कर लिया।
आगे की कथा - राम का स्वर्णमृग के पीछे जाना
Valmiki Ramayn is a great Hindu epic created by Maharshi Valmiki in Sanskrit language. Maharshi Valmiki describes the holly character or Lord Rama in Valmiki Ramayan. Lord Rama is treated as a person by Manarshi Valmiki where as in the epic Ramcharitmanas Saint Tulsidas treats him as an incarnation of Lord Vishnu.
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