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बालकाण्ड

वाल्मीकि रामायण
Valmiki Ramayan

अयोध्याकाण्ड

valmiki ramayan

राम और भरत का मिलाप

राम ने भरत को हृदय से लगाकर समझाते हुये कहा, "भैया भरत! तुम तो स्वयं नीतिवान हो। सोचो, क्या मेरे जैसे सत्यपरायण व्यक्ति के लिये राज्य के निमित्त पिता के वचनों को भंग कर धर्म से पतित ह瓥9;ना उचित है? तुम्हारे अन्दर तो मैं कोई दोष नहीं देखता। फिर तुम दुःखी और लज्जित क्यों होते हो? और जहाँ तक माता कैकेयी का प्रश्न है, उनकी निन्दा करना भी उचित नहीं है क्योंकि उन्होंने जो वर माँगे थे वे पिताजी की अनुमति से ही माँगे थे। मैं माता कैकेयी का उतना ही सम्मान करता हूँ जितना माता कौशल्या का। फिर मैं पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन कैसे कर सकता हूँ। वे अपने हाथों से तुम्हें राज्य दे गये हैं, इसलिये उसे ग्रहण करना तुम्हारा धर्म है। फिर जब पिताजी ही स्वर्ग चले गये तो फिर अयोध्या में मेरा क्या काम? मैं तो ऐसा अभागा हूँ कि न तो मैं उनकी सेवा कर सका, न उनके अन्तिम दर्शन कर सका और न उनका दाह संस्कार ही कर सका।" यह कहते हुये राम के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। फिर उन्होंने सीता से जाकर कहा, "प्रिये! तुम्हारे श्वसुर स्वर瓥्गलोक सिधार गये।" और लक्ष्मण से बोले, "भैया! हम पितृविहीन हो गये। भरत ने मुझे अभी बताया है।" यह सूचना पाकर सीता और लक्ष्मण दोनों ही बिलख-बिलख कर रो पड़े। इसके पश्चात् राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ मन्दाकिनी के तट पर जाकर हंगुदी का गूदा ले और वक्कल चीर धारणकर पिता को जलांजलि दी। हंगुदी के गूदे का पिण्ड बना कर उसे कुशा पर रखते हुये उनका तर्पण किया। इस प्रकार पिण्डोदक दे स्नानादि कर अपनी कुटिया में लौटे और भाइयों को भुजाओं में समेट कर रोने लगे।

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चारों भाइयों के रोने का आर्तनाद सुनकर वशिष्ठ आदि सहित सब रानियाँ वहाँ आ पहुँचीं तथा वे भी विलाप करने लगीं। फिर हृदय में धैर्य धर कर राम, लक्ष्&瓥2350;ण और सीता ने सब रानियों एवं गुरु वशिष्ठ की चरण वन्दना की। इसके पश्चात् समस्त आगत रामचन्द्र को घेर कर बैठ गये और वह रात्रि महाराज दशरथ के विषय में शोक चर्चा करते हुये व्यतीत हो गई। प्रातःकाल नित्यकर्म आदि से निवृत होकर भरत राजगुरु तथा मन्त्रियों के साथ आकर राम से बोले, "हे रघुकुलमणि! प्रतिज्ञा से बँधे हुये पिताजी ने अयोध्या का राज्य मुझे दिया था। मैं वही राज्य आपको समर्पित करता हूँ। आप इसे कृपा करके अस्वीकार न करें। इस पर राम ने कहा, "भरत! मैं जानता हूँ कि पिता की मृत्यु और मेरे वनवास से तुम्हें बहुत दुःख हुआ है। किन्तु यह भाग्य का विधान था। इसमें किसी का कोई दोष नहीं है। संयोग के साथ वियोग का और जन्म के साथ मृत्यु का अटूट सम्बंध है। हमारे पिता सहस्त्रों यज्ञ, दान तप आदि करके स्वर्ग गये हैं। इसलिये वे शोक &#瓥325;रने योग्य नहीं हैं। तुम पिताजी की आज्ञा मानकर अयोध्या का राज्य करो, मैं भी उनकी आज्ञा का पालन करते हुये वन में निवास करूँगा। पिता की आज्ञा भंग करने से मुझे और तुम्हें दोनों को ही नरक की यातना भोगनी पड़ेगी।" राम के मुख से ये तर्कपूर्ण वचन सुनकर भरत हाथ जोड़कर बोले, "हे महात्मन्! जिस समय यह दुर्घटना घटी, मैं नाना के घर में था। मेरी माता की मूर्खता के कारण यह सारा अनिष्ट हुआ। ऐसी दशा में धर्माधर्म का कुछ ज्ञान रखने के कारण मैं आपके अधिकार का अपहरण कैसे कर सकता हूँ? फिर क्षत्रिय का धर्म तो प्रजा का पालन करना है, जटा धारण करके तपस्वी बनना नहीं। मैं आपसे आयु, ज्ञान, विद्या आदि सबमें छोटा होते हुये सिंहासन पर कैसे बैठ सकता हूँ? अतएव आप राजसिंहासन पर बैठकर मेरे माता को लोक निन्दा से और पिताजी को पाप से बचाइये। यदि आप ऐस瓥6; नहीं कर सकते तो मुझे भी वन में रहने की अनुमति दीजिये।"

रामचन्द्र ने भरत को पुनः समझाते हुये कहा, "पिताजी ने तुम्हें राज्य और मुझे चौदह वर्ष के लिये वनवास दिया है। जिस प्रकार मैं उनके वचनों पर अविचल श्रद्धा रखकर उनकी आज्ञा का पालन कर रहा हूँ, उसी प्रकार तुम्हें भी उनकी आज्ञा को अकाट्य मानकर अयोध्या पर शासन करना चाहिये। उनके वचनों को अवहेलना करके उनकी आत्मा को क्लेश मत पहुँचाओ। बुद्धिमान शत्रुघ्न तुम्हें राजकार्य में समुचित सहायता देंगे। मैं दण्डक वन में प्रवेश करूँगा। इस प्रकार हम चारों भाई पिताजी को अपनी प्रतिज्ञा के ऋण से मुक्ति दिलायेंगे।"

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राम के वचनों को सुनकर अयोध्या के अत्यन्त चतुर मन्त्री जाबालि ने कहा, "रामचन्द्र! आपको यह स्瓥50;रण रखना चाहिये कि संसार में कोई किसी का सम्बंधी नहीं है। सारे नाते मिथ्या हैं। इनके मायाजाल में फँसकर स्वयं को नष्ट करना बुद्धिमानी नहीं है। इसलिये पितृऋण के मिथ्या विचार का परित्याग कर आप राज्य को स्वीकार करें। न कोई स्वर्ग है, न कोई परलोक है, न कोई कर्मों का फल देने वाला है। जो कुछ भी सामने है, वही सत्य है। परलोक की मिथ्या कल्पना से अपना जीवन दुःखी बनाना राजकुमारों के लिये उचित नहीं है।"

जाबालि के इस मन्त्रणा को सुनकर राम बोले, "मन्त्रिवर! आपने मेरे हित के लिये जो कुछ भी कहा वह वास्तव में अहितकारी है। ये विचार नास्तिकों को शोभा देते हैं। सदाचार और सच्चरित्रता का अपना महत्व है। यदि राजा सत्य के मार्ग से विचलित हो जायेगा तो प्रजा भी उसका अनुसरण कर कुपथगामी हो जायेगी। अतएव मैं आपके इस अनुचित परामर्श è瓥;ो स्वीकार करने में असमर्थ हूँ। मुझे तो दुःख इस बात का है कि पिताजी जैसे परम आस्तिक धर्मपरायण नरेश ने आप जैसे नास्तिक व्यक्ति को मन्त्रीपद क्यों दिया।।" राम के कठोर वचन सुनकर जाबालि ने कहा, "राघव! मैं नास्तिक नहीं हूँ। भरत के बार-बार आग्रह करने पर भी जब आपने उनकी बात नहीं मानी तो आपको लौटा ले जाने के लिये मैंने अनुचित तर्क का सहारा लिया। मेरी मन्द बुद्धि में और कोई उपाय नहीं सूझा।"

जब राम किसी प्रकार भी भरत की प्रार्थना को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं हुये तो भरत ने हाथ जोड़कर कहा, "हे तात! यह राज्य आपका है, मैं इसे ग्रहण नहीं कर सकता। यह मेरी अटल प्रतिज्ञा है। यदि आप पिताजी की आज्ञा का पालन ही करना चाहते हैं तो आपके स्थान में वन में मैं रहूँगा और इस प्रकार पिता को माता के ऋण से मुक्त करूँगा।" भरत के ये स्नेहप&瓥2370;र्ण वचन सुनकर राम मन्त्रियों और पुरवासियों की ओर देखकर बोले, "स्वर्गीय पिताजी ने जो कुछ कर दिया, उसे न तो मैं उलट सकता हूँ और न भरत। वनवास की आज्ञा तो मुझे हुई है, न कि भरत को। माता कैकेयी ने जो कहा है, वह उचित है और पिताजी ने जो कुछ किया है वह भी उचित है। भरत मातृ-पितृ एवं गुरुभक्त हैं, सर्वगुण सम्पन्न हैं। इसलिये वे ही राज्य करें और पिताजी को ऋण मुक्त करें।"

जब भरत ने राम के अयोध्या लौटने का कोई उपाय न देखा तो उन्होंने रोते हुये कहा, "भैया! यह मैं जानता हूँ कि आपकी प्रतिज्ञा अटल है, परन्तु यह बात भी उतनी ही अटल है कि अयोध्या का राज्य भी आप ही का है। इसलिये आप अपनी चरण पादुकाएँ मुझे दे दीजिये। इन्हें मैं अयोध्या के राजसिंहासन पर रखूँगा और स्वयं नगर के बाहर रहकर आपके सेवक के रूप में राजकाज चलाउँगा। वक्कल धारण करके瓥ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूँगा। चौदहवें वर्ष के अन्तिम दिन यदि आप अयोध्या न पहुँचे तो मैं अग्नि में स्वयं को भस्म कर दूँगा, यह मेरी अटल प्रतिज्ञा है।" इस पर रामचन्द्र जी ने भरत को कण्ठ से लगाकर उन्हें अपनी पादुका दे दी और शत्रुघ्न को समझाते हुये कहा, "भैया! माता कैकेयी को कभी अपशब्द कहकर उनका अपमान मत करना। वे हम सबकी पूज्य माता हैं। इस बात को कभी न भूलना, तुम्हें मेरी और सीता की शपथ है।" फिर माताओं को धैर्य बँधा कर सम्मानपूर्वक सबको विदा किया।

श्री राम की चरण पादुकाएँ ले भरत शत्रुघ्न सहित रथ पर सवार हुये। उनके पीछे चलने वाले रथों पर माताएँ, गुरु एवं पुरोहित, मन्त्रीगण तथा अन्य पुरवासी चले। उनके पीछे सेना चली। उदास मन से सब लोग मार्ग की दूरी पारकर तीन दिन में अयोध्या पहुँचे। मार्ग की क्लान्ति को मिटाकर瓥 भरत गुरु वशिष्ठ के पासे जाकर बोले, "गुरुदेव! यह तो आप जानते ही हैं कि अयोध्या के वास्तविक नरेश राम हैं। उनकी अनुपस्थिति में उनकी चरण पादुकाएँ सिंहासन की शोभा बढ़ायेंगी। मैं नगर से दूर नन्दि ग्राम में पर्णकुटी बनाकर निवास करूँगा और वहीं से राजकाज का संचालन करूँगा।" फिर समस्त मन्त्रियों को उनका कार्य सौंपकर वे नन्दि ग्राम से राज्य का कार्य राम के प्रतिनिधि के रूप में देखने लगे।

आगे की कथा - महर्षि अत्रि का आश्रम

Valmiki Ramayn is a great Hindu epic created by Maharshi Valmiki in Sanskrit language. Maharshi Valmiki describes the holly character or Lord Rama in Valmiki Ramayan. Lord Rama is treated as a person by Manarshi Valmiki where as in the epic Ramcharitmanas Saint Tulsidas treats him as an incarnation of Lord Vishnu.

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