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बालकाण्ड
वाल्मीकि रामायण Valmiki Ramayan
अयोध्याकाण्ड

गंगा पार करना
राम ने ब्राह्म बेला होते ही शैया का परित्याग कर दिया और लक्ष्मण से कहा, "भैया अब रात्रि अपनी अंतिम अवस्था में है। उषा की लालिमा ने सम्पूर्ण अंबर पर गुलाल बिखेर दिया है। कोयल की कूक सुनाई दे रही है। मोर नृत्य कर रहे हैं। यही वह अवसर है 瓥#2332;ब कि हमें परम पावन गंगा को पार कर लेना चाहिये।" उनके वचनों को सुनकर लक्ष्मण के साथ खड़े निषादराज ने अपने मन्त्रियों को आदेश दिया कि एक सुन्दर पतवारों वाली द्रुतगामी नौका ले आओ। मैं स्वयं उस नौका को खे कर इन्हें गंगा पार कराउँगा। आज्ञा पाते ही निषादराज के अनुचर तत्काल जाकर उनके लिये एक श्रेष्ठ नौका ले आये। नौका के घाट पर लग जाने पर राम, सीता और लक्ष्मण घाट की ओर चले।
उन्हें घाट की ओर जाते देखकर मन्त्री अश्रुपूरित सुमन्त ने हाथ जोड़ते हुये कहा, "हे रघुकुलशिरोमणि! अब मेरे लिये क्या आज्ञा है?" रामचन्द्र ने उनकी कर्तव्यनिष्ठा की प्रशंसा करते एवं धन्यवाद देते हुये कहा, "सुमन्त! अब आपका 瓥#2325;ार्य पूर्ण हो चुका है अतः अब आप शीघ्र अयोध्या के लिये प्रस्थान करें। गंगा पार करने पश्चात् हम उसके आगे की यात्रा पैदल ही करेंगे। आप अयोध्या जाकर मेरी, सीता और लक्ष्मण की ओर से पिताजी, माताओं एवं अन्य गुरुजनों की चरण वन्दना करें और उन्हें धैर्य दिलाते हुये हमारी ओर से कहें कि हम तीनों में से किसी को भी अपने वनवास का किन्चितमात्र भी दुःख नहीं है। उन्हें मेरा यह संदेश भी दें कि चौदह वर्ष की अवधि समाप्त होने पर मैं, सीता और लक्ष्मण आपके दर्शन करेंगे। आप भाई भरत को कैकेय से शीघ्र बुला लें तथा राज्य सिंहासन सौंप दें ताकि प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट व असुविधा न हो। हे मन्त्रिवर! भरत से भी मेरा यह संदेश देना कि वे सभी माताओं का समान रूप से आदर करें और प्रजाजनों के हितों का सदैव ध्यान रखें।"
राम के वचन सुनकर सुमन्त अत्यंत विह्वल हो गये और उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। वे अवरुद्ध कण्ठ से बोले, "हे तात! आपके वियोग में संतप्त होकर तड़पती हुई अयोध्या की प्रजाजनों के सम्मुख मैं कैसे जा सकूँगा? आप लोगों के बिना खाली हाथ लौट आने के विषय में पूछे गये उनके प्रश्नों का मैं क्या उत्तर दूँगा? मैं जानता हूँ कि आपको न पाकर सहस्त्रों अयोध्यावासी शोक से मूर्छित हो जायेंगे। उनकी दशा सेनापति रहित सेना जैसी हो जायेगी। हे स्वामी! अयोध्या से वन के लिये चलते समय जो दशा अयोध्यावासियों की हुई थी वह तो आप देख ही चुके हैं। इस खाली रथ को देख कर उनकी उससे भी सैकड़ों गुणा दुःखदायिनी दशा हो जायेगी। हे प्रभु! मैं माता कौशल्या को कैसे अपना मुख दिखा सकूँगा? आप लोगों के बिना लौटना मे瓥52;े लिये बड़ा कठिन है। इसलिये हे नाथ! आप कृपा करके मुझे भी अपने साथ ले चलें।"
सुमन्त के इन दीन किन्तु स्नेहभरे वचनों को सुनकर राम ने प्रेमपूर्वक कहा, "भाई सुमन्त! मै अच्छी तरह से समझता हूँ कि तुम मुझसे बहुत अधिक स्नेह करते हो। किन्तु तुम्हारे न लौटने से माता कैकेयी के मन में शंका उत्पन्न हो जायेगी और वे समझेंगी कि हम लोग षड़यंत्र करके राज्य में ही कहीं छुप गये हैं। इसलिये मेरा तुमसे अनुरोध है कि तुम नगर को लौट जाओं। तुम्हारे लौटने से जहाँ माता कैकेयी की शंका समाप्त हो जायेगी वहीं महाराज तथा मुझ पर किसी प्रकार का कलंक भी नहीं लगेगा। कलंक चाहे झूठा ही क्यों न हो, उसकी प्रतिक्रिया बड़ी व्यापक होती है।" इस प्रकार अनेकों प्रकार से समझा बुझाकर रामचन्द्र ने सुमन्त को विदा किया। सुमन्त अश्रुपूरित नेत्रों से रथ म瓥75;ं बैठ कर अयोध्या के लिये चल पड़े।
सुमन्त के जाने के पश्चात् राम गुह से बोले, "निषादराज! तुम कृपा करके हमारे लिये बड़ का दूध मँगा दो क्योंकि अब हम वनवासी और तपस्वी हो गये हैं और हमें जटाएँ धारण करके तापस धर्म की मर्यादाओं का पालन करते हुये निर्जन वनों में निवास करना चाहिये।" राम की बात सुन कर गुह स्वयं जाकर बड़ का दूध ले आये जिससे राम, सीता और लक्ष्मण ने जटाएँ बनाईं और नियमपूर्वक तपस्वी धर्म को स्वीकार करते हुये गंगा पार करने को उद्यत हुये। नौका पर सवार होकर तीनों ने पतित-पावनी गंगा को पार किया। गंगा के पार पहुँच जाने पर राम ने गुह को हृदय से लगा लिया। फिर उनके स्नेहपूर्ण आतिथ्य के लिये उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुये उन्होंने निषादराज को विदा किया।
भारद्वाज के आश्रम में
Valmiki Ramayn is a great Hindu epic created by Maharshi Valmiki in Sanskrit language. Maharshi Valmiki describes the holly character or Lord Rama in Valmiki Ramayan. Lord Rama is treated as a person by Manarshi Valmiki where as in the epic Ramcharitmanas Saint Tulsidas treats him as an incarnation of Lord Vishnu.
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