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बालकाण्ड

राम जन्म
महर्षि विश्वामित्र का आगमन
कामदेव का आश्रम
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अलभ्य अस्त्रों का दान
विश्वामित्र का आश्रम
मारीच और सुबाहु का वध
धनुष यज्ञ के लिये प्रस्थान
गंगा-जन्म की कथा (1)
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विवाहपूर्व की औपचारिकताएँ
विवाह
परशुराम जी का आगमन
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अयोध्याकाण्ड

अयोध्याकाण्ड आरम्भ
राजतिलक की तैयारी
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राम का वनवास
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सीता और लक्ष्मण का अनुग्रह
राम के द्वारा दान
पिता के अन्तिम दर्शन
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तमसा के तट पर
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गंगा पार करना
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चित्रकूट की यात्रा
चित्रकूट में
सुमन्त का अयोध्या लौटना
श्रवण कुमार की कथा
राजा दशरथ की मृत्यु
भरत-शत्रुघ्न की वापसी
दशरथ की अन्त्येष्टि और भरत का वनगमन
राम और भरत का मिलाप
भरत का अयोध्या लौटना
महर्षि अत्रि का आश्रम

अरण्यकाण्ड

दण्डक वन में विराध वध
महर्षि शरभंग का आश्रम
सीता की शंका
अगस्त्य मुनि के आश्रम में
पंचवटी में आश्रम
शूर्पणखा के नाक-कान काटना
खर-दूषण से युद्ध
खर-दूषण वध
अकम्पन रावण के पास
रावण को शूर्पणखा का धिक्कार
राम का स्वर्णमृग के पीछे जाना
सीता हरण
जटायु वध
रावण-सीता संवाद
राम की वापसी और विलाप
जटायु से भेंट
कबंध का वध
शबरी का आश्रम

किष्किन्धाकाण्ड

पम्पासर में राम हनुमान भेंट
राम-सुग्रीव मैत्री
राम-सुग्रीव वार्तालाप
बालि-वध
तारा का विलाप
सुग्रीव का अभिषेक
हनुमान-सुग्रीव संवाद
लक्ष्मण-सुग्रीव संवाद
वानरों द्वारा सीता की खोज
हनुमान को मुद्रिका देना
जाम्बवन्त द्वारा हनुमान को प्रेरणा

सुन्दरकाण्ड

हनुमान का सागर पार करना
लंका में सीता की खोज
हनुमान जी अशोक वाटिका में
रावण-सीता संवाद
रावण-सीता संवाद (2)
जानकी राक्षसी घेरे में
हनुमान सीता भेंट
हनुमान का सीता को मुद्रिका देना
हनुमान का सीता को धैर्य बँधाना
हनुमान का सीता को अपना विशाल रूप दिखाना
हनुमान राक्षस युद्ध
मेधनाद हनुमान युद्ध
रावण के दरबार में
लंका दहन
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लंकाकाण्ड

समुद्र पार करने की चिन्ता
वानर सेना का प्रस्थान
लंका में राक्षसी मन्त्रणा
विभीषण का निष्कासन
विभीषण की शरणागति
सेतु बन्धन
सीता के साथ छल
अंगद रावण दरबार में
राम लक्ष्मण बन्धन में
धूम्राक्ष और वज्रदंष्ट्र का वध
अकम्पन का वध
प्रहस्त का वध
रावण कुम्भकर्ण संवाद
कुम्भकर्ण वध
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मेघनाद वध
युद्ध के लिये रावण का प्रस्थान
भयानक युद्ध
लक्ष्मण मूर्छित
रावण वध
मन्दोदरी का विलाप और रावण की अन्त्येष्टि
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अयोध्या को प्रस्थान
भरत-मिलाप तथा राम का राज्यभिषेक

उत्तरकाण्ड

रावण के जन्म की कथा
रावण के जन्म की कथा (2)
रावण के जन्म की कथा (3)
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अभ्यागतों की विदाई
पुरवासियों में अशुभ चर्चा
पुरवासियों में अशुभ चर्चा
सीता का निर्वासन
लक्ष्मण की वापसी
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राजा निमि की कथा
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भरत व लक्ष्मण के पुत्रों के लिये राज्य व्यवस्था
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बालकाण्ड

वाल्मीकि रामायण
Valmiki Ramayan

अयोध्याकाण्ड

valmiki ramayan

वन की यात्रा

तमसा नदी को पार करने के पश्चात् सुमंत रथ को तीव्र गति से हाँकने लगे। कौशल देश की अंतिम सीमा तक पहुँचते-पहुँचते भगवान भुवन भास्कर उदित हो गये। सीमा पार करते ही राम रथ से नीचे उतरे और अयोध्या की ओर मुख कर श्रद्धापूर्ण वचनों में कहने लगे, "सूर्यकुल के सत्यवादी नरेशों द्वारा स्नेहपूर्वक परिपालित हे अयोध्या नगरी! विवश होकर आ瓥32; मुझे तुझसे दीर्घकाल के लिये पृथक होना पड़ रहा है। हे जन्मभूमि! मेरी दृष्टि में तुम सदैव स्वर्ग से भी अधिक श्रद्धेय और पूजनीय रही हो। तुम्हारी सेवा करना मेरे लिये गौरव का विषय होता, किन्तु परिस्थितिवश मुझे आज तुम्हारी सेवा से विमुख होना पड़ रहा है। हे जननी! तुम सदैव मेरे लिये प्रेरणामयी रही हो। तुम्हारी धूलि मुझे चन्दन की भाँति शान्ति देती थी, तुम्हारा जल मेरे लिये अमृतमयी और जीवनदायी था। तुमसे विदा लेते हुये मेरा हृदय भारी हुआ जा रहा है। पिताजी की आज्ञा का पालन करके चौदह वर्ष पश्चात् मैं फिर तुम्हारे दर्शन करूँगा तथा तुम्हारी सेवा का सौभाग्य प्राप्त करूँगा। तब तक के लिये हे माता! मुझे विदा दो। हे माता! तुम्हें शतशत प्रणाम! कोटि कोटि प्रणाम!!" इतना कह कर राम ने अयोध्या प्रदेश की धूलि को उठाकर मस्तक से &#瓥354;गा लिया। ऐसा करते समय उनके नेत्र अश्रुपूरित हो गये। फिर प्रयास करके उन्होंने अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया और पुनः रथ पर आसीन हो गये।

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रथारूढ़ हो जाने के पश्चात् वे लक्ष्मण एवं सीता को मातृभूमि की गरिमा एवं महत्व के विषय में बताने लगे। द्रुत गति से दौड़ता हुआ रथ निर्मल जल से युक्त वेदश्रुति नामक नदी के तट पर जा पहुँचा। उसके बाद रथ दक्षिण दिशा की ओर चलता हुआ अगस्त्य मुनि के समीप पहुँच गया। कुछ ही दूरी पर विख्यात गोमती नदी प्रवाहित हो रही थी। सरिता के दोनों तटों पर सहस्त्रों गौओं के झुंड हरी-हरी घास चरा करती थीं। गोमती नदी को पार करके वे परम पावन भागीरथी गंगा के तट पर पहुँच गये। ç瓥;स उस सुरम्य वातावरण में वे बहुत देर तक चकित से खड़े रहे। उन्होंने देखा दूर-दूर तक हरे भरे खेत नेत्रों को सुख देने वाली हरीतिमा बिखेर रहे हैं। वातावरण अत्यंत सुरम्य है। स्वर्णकलशों से सुशोभित धवल मंदिर भक्ति भावना जागृत कर रहे हैं। आश्रमों में साम गान की ध्वनि गुंजायमान हो रही है। सम्पूर्ण वायुमण्डल हवन कुण्डों से निकलने वाले धुएँ से सुगन्धित हो रहा है। अनन्य काल से ऋषि-मुनियों द्वारा सेवित पवित्र भागीरथी कल-कल नाद के साथ द्रुत गति से प्रवाहित हो रही है। गंगा के जल में हंस, कारण्डव आदि पक्षी विहार करते हुये मधुर स्वर में गा रहे हैं मानों वे गंगा की स्तुति कर रहे हों। त्रयतापहारिणी पुण्यसलिला गंगा के दोनों तटों पर खड़े वृक्ष रंग-बिरंगे पुष्पों से सुसज्जित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे अपने फूलों क瓥6; अर्ध्य चढ़ाकर गंगा का अभिषेक कर रहे हैं।

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वे इस मनोमुग्धकारी छवि में लीन हो गये। कुछ देर के पश्चात् राम सुमन्त से बोले, "मन्त्रिवर! आज हम यहीं विश्राम करेंगे। हंगुदी के उस विशाल वृक्ष पर लगे हुये फल कितने सुन्दर तथा आकर्षक हैं। आज हम इन्हीं फलों का आहार करेंगे और रात्रि भी यहीं पर व्यतीत करेंगे।" रामचन्द्र का आदेश पाते ही सुमन्त ने रथ को हंगुदी के वृक्ष के नीचे खड़ा कर दिया और अश्वों को निकट ही हरी-हरी घास चरने के लिये छोड़ दिया।

आगे की कथा - भीलराज गुह

Valmiki Ramayn is a great Hindu epic created by Maharshi Valmiki in Sanskrit language. Maharshi Valmiki describes the holly character or Lord Rama in Valmiki Ramayan. Lord Rama is treated as a person by Manarshi Valmiki where as in the epic Ramcharitmanas Saint Tulsidas treats him as an incarnation of Lord Vishnu.

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