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बालकाण्ड
वाल्मीकि रामायण Valmiki Ramayan
अयोध्याकाण्ड

सीता और लक्ष्मण का अनुग्रह
माता कौशल्या से विदा लेने के पश्चात् राम अपनी पत्नी जनकनन्दिनी सीता के कक्ष में पहुँचे। वे राजसी चिह्नों से पूर्णतः विहीन थे। राम को अपने कक्ष में आते देख सीता ने पूछा, "हे आर्यपुत्र! आज आपके राज्याभिषेक का दिन है फिर आप राजसी चिह्नों से विहीन क्यों हैं?" गंभीर किन्तु शान्त वाणी में राम ने सीता के समक्ष समस्त घटनाओं का वर्णन किया और कहा, "प्रिये! मैं तत瓥81;काल ही वक्कल धारण करके वन के लिये प्रस्थान करना चाहता हूँ इसलिये मैं तुमसे विदा माँगने आया हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरे जाने के बाद तुम अपने मृदु स्वभाव तथा सेवा सुश्रूषा से माता-पिता तथा भरत सहित समस्त परिजनों को प्रसन्न और सन्तुष्ट रखना। तुम अब तक मेरी प्रत्येक बात श्रद्धापूर्वक मानती आई हो मैं चाहता हूँ कि आगे भी मेरी इच्छानुसार तुम यहाँ रहकर अपने कर्तव्य का पालन करो।"
सीता बोलीं, "प्राणनाथ! शास्त्रों के अनुसार पत्नी अर्द्धांगिनी होती है। मेरा तात्पर्य यह है कि केवल आपको ही नहीं मुझे भी वनवास की आज्ञा मिली है। कोई विधान नहीं कहता कि पुरुष का आधा अंग वन में रहे और आधा अंग घर瓥 में। हे नाथ! स्त्री की गति तो उसके पति के साथ ही होती है, इसलिये मैं भी आपके साथ वन चलूँगी। वहाँ मैं आपके साथ रहकर आपके चरणों के सेवा करके अपना कर्तव्य निबाहूँगी। पति की सेवा करके पत्नी को जो अपूर्व सुख प्राप्त होता है है वह सुख इस लोक में तो क्या परलोक में भी प्राप्त नहीं हो सकता। पति ही पत्नी के लिये परमेश्वर होता है। यदि आप कन्द-मूल-फलादि से अपनी उदर पूर्ति करेंगे तो मैं भी वैसे ही अपनी क्षुधा शांत करूँगी। आपसे विलग होकर स्वर्ग का सुख-वैभव भी मैं स्वीकार नहीं कर सकती। यदि आप मेरी इस विनय और प्रार्थना की उपेक्षा करके मुझे अयोध्या में छोड़ जायेंगे तो उसी क्षण मैं अपना प्राणत्याग दूँगी जिस क्षण आप वन के लिये प्रस्थान करेंगे। यही मेरी प्रतिज्ञा है।"
वन में होने वाले कष्टों को ध्यान में रख के राम अपने साथ सीता को वन में नहीं ले जाना चाहते थे। इसलिये वे उन्हें समझाने का प्रयत्न करने लगे किन्तु जितना वे प्रयत्न करते थे सीता उतनी ही अधिक हठ करने लगतीं। किसी भी प्रकार से समझाने बुझाने का प्रयास करने पर वे अनेक प्रकार के शास्त्र सम्मत तर्क करने लगतीं और उनके प्रयास को विफल करती जातीं। उनकी इस दृढ़ता के सामने राम का प्रत्येक प्रयास विफल हो गया और अन्त में उन्हें सीता को अपने साथ वन ले जाने की आज्ञा देने के लिये विवश होना पड़ा। लक्ष्मण ने भी सीता की तरह राम के साथ वन में जाने के लिये बहुत अनुग्रह किया। राम के द्वारा बहुत प्रकार से समझाने के बाद भी लक्ष्मण उनके साथ जाने के विचार पर दृढ़ रहे। अन्ततः राम को लक्ष्मण की दृढ़ता, स्नेह तथा अनुग्रह के सामने झुकना 瓥346;ड़ा एवं लक्ष्मण को भी साथ जाने की अनुमति देनी ही पड़ी।
सीता और लक्ष्मण ने कौशल्या तथा सुमित्रा दोनों माताओं से आज्ञा लेने बाद, अनुनय विनय करके महाराज दशरथ से भी वन जाने की अनुमति देने के लिये मना लिया। उसके पश्चात् लक्ष्मण शीघ्र आचार्य के पास पहुँचे और उनसे समस्त अस्त्र-शस्त्रादि लेकर राम के पास उपस्थित हो गये। लक्ष्मण के आने पर राम ने कहा, "भाई! वन के लिये प्रस्थान करने के पूर्व मैं अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति ब्राह्मणों, दास दासियों तथा याचकों में वितरित करना चाहता हूँ इसलिये तुम गुरु वशिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र को बुला लाओ।"
आगे की कथा - राम के द्वारा दान
Valmiki Ramayn is a great Hindu epic created by Maharshi Valmiki in Sanskrit language. Maharshi Valmiki describes the holly character or Lord Rama in Valmiki Ramayan. Lord Rama is treated as a person by Manarshi Valmiki where as in the epic Ramcharitmanas Saint Tulsidas treats him as an incarnation of Lord Vishnu.
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