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बालकाण्ड

राम जन्म
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अलभ्य अस्त्रों का दान
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अयोध्याकाण्ड

अयोध्याकाण्ड आरम्भ
राजतिलक की तैयारी
कैकेयी कोपभवन में
कैकेयी द्वारा वरों की प्राप्ति
राम का वनवास
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तमसा के तट पर
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चित्रकूट की यात्रा
चित्रकूट में
सुमन्त का अयोध्या लौटना
श्रवण कुमार की कथा
राजा दशरथ की मृत्यु
भरत-शत्रुघ्न की वापसी
दशरथ की अन्त्येष्टि और भरत का वनगमन
राम और भरत का मिलाप
भरत का अयोध्या लौटना
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अरण्यकाण्ड

दण्डक वन में विराध वध
महर्षि शरभंग का आश्रम
सीता की शंका
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पंचवटी में आश्रम
शूर्पणखा के नाक-कान काटना
खर-दूषण से युद्ध
खर-दूषण वध
अकम्पन रावण के पास
रावण को शूर्पणखा का धिक्कार
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पम्पासर में राम हनुमान भेंट
राम-सुग्रीव मैत्री
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सुन्दरकाण्ड

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लंका में सीता की खोज
हनुमान जी अशोक वाटिका में
रावण-सीता संवाद
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लंकाकाण्ड

समुद्र पार करने की चिन्ता
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युद्ध के लिये रावण का प्रस्थान
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उत्तरकाण्ड

रावण के जन्म की कथा
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वाल्मीकि रामायण
Valmiki Ramayan

अयोध्याकाण्ड

valmiki ramayan

राम का वनवास

राम ने अपने पिता दशरथ एवं माता कैकेयी के चरणस्पर्श किये। राम को देखकर महाराज ने एक दीर्घ श्‍वास लेकर केवल "हे राम!" कहा और अत्यधिक निराश होने के कारण चुप हो गये। उनके नेत्र अश्रुजल से परिपूरित हो गये। राम ने कैकेयी से विनम्र स्वर में पूछा, "माता! पिताजी की ऐसी दशा का क्या कारण है? क्या वे मुझसे अप्रसन्न है瓥#2306;? यदि वे मुझसे अप्रसन्न हैं तो मैं क्षणमात्र भी नहीं जीना चाहता।"

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कैकेयी ने कहा, "वत्स! महाराज तुमसे अप्रसन्न तो हो ही नहीं सकते। हाँ, किंतु इनके हृदय में एक विचार उठा है जो कि तुम्हारे विरुद्ध है इसीलिये ये तुमसे संकोचवश कह नहीं पा रहे हैं। बात यह है कि देवासुर संग्राम के समय इन्होंने मुझे दो वर देने का वचन दिया था। अवसर पाकर आज मैंने इनसे वे दोनों वर माँग लिये। अब तुम्हारी सहायता के बिना तुम्हारे पिता की प्रतिज्ञा का निर्वाह होना असंभव है। यदि तुम प्रतिज्ञा करोगे कि जो कुछ मैं कहूँगी, उसका तुम अवश्य पालन करोगे तो मैं तुम्हें उन वरदानों के विषय में अवगत करा सकती हूँ।" माता के वच&瓥2344; सुनकर राम बोले, "हे माता! पिता की आज्ञा से मैं अपने प्राणोत्सर्ग भी सकता हूँ। मैं आपके चरणों की सौगन्ध खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपके वचनों का अवश्य पालन करूँगा।"

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इस प्रकार राम से प्रतिज्ञा करवाने एवं सन्तुष्ट होने पर कैकेयी ने कहा, "वत्स! मैंने पहले वर से भरत के लिये अयोध्या का राज्य और दूसरे से तुम्हारे लिये चौदह वर्ष का वनवास माँगा है। अब तुम अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार तत्काल वक्कल धारण करके वन को प्रस्थान करो। तुम्हारे मोह के कारण महाराज दुःखी हो रहे हैं अतः तुम्हारे जाने के पश्चात् ही भरत का राज्याभिषेक होगा।। मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम अपनी प्रतिज्ञा का पालन करके राजा को पापरूपी सागर से अवश्य मुक्ति दिलाओगे।"

कैकेयी के वचनों कí瓥; राम ने दुःख और शोक से रहित होकर सुना और मधुर मुस्कान के साथ बोले, "माता! बस इस छोटी सी बात के लिये ही आप और पिताजी इतने परेशान हो रहे हैं? मैं अभी ही वन को चला जाता हूँ। यही मेरी सत्य प्रतिज्ञा है।" महाराज दशरथ, जो राम और कैकेयी के इस संवाद को सुन रहे थे, एक बार फिर मूर्छित हो गये। राम न मूर्छित पिता और कैकेयी के चरणों में मस्तक नवाया और चुपचाप उस प्रकोष्ठ से बाहर चले गये।

आगे की कथा - माता कौशल्या से विदा

Valmiki Ramayn is a great Hindu epic created by Maharshi Valmiki in Sanskrit language. Maharshi Valmiki describes the holly character or Lord Rama in Valmiki Ramayan. Lord Rama is treated as a person by Manarshi Valmiki where as in the epic Ramcharitmanas Saint Tulsidas treats him as an incarnation of Lord Vishnu.

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