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बालकाण्ड

राम जन्म
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अयोध्याकाण्ड

अयोध्याकाण्ड आरम्भ
राजतिलक की तैयारी
कैकेयी कोपभवन में
कैकेयी द्वारा वरों की प्राप्ति
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चित्रकूट में
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भरत-शत्रुघ्न की वापसी
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महर्षि अत्रि का आश्रम

अरण्यकाण्ड

दण्डक वन में विराध वध
महर्षि शरभंग का आश्रम
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खर-दूषण से युद्ध
खर-दूषण वध
अकम्पन रावण के पास
रावण को शूर्पणखा का धिक्कार
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पम्पासर में राम हनुमान भेंट
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सुन्दरकाण्ड

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लंका में सीता की खोज
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रावण-सीता संवाद
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लंकाकाण्ड

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मेघनाद वध
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पुरवासियों में अशुभ चर्चा
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बालकाण्ड

वाल्मीकि रामायण
Valmiki Ramayan

अयोध्याकाण्ड

valmiki ramayan

कैकेयी द्वारा वरों की प्राप्ति

राजकार्य से निवृत होकर उल्लासित महाराज दशरथ राम के राजतिलक का शुभ समाचार सुनाने के लिये अपनी सबसे प्रिय रानी कैकेयी के पास पहुँचे। कैकेयी को अपने महल में अनुपस्थित पाकर राजा दशरथ ने उसके विषय में एक दासी से पूछा। दासी से समाचार प्राप्त हुआ कि रुष्ट होकर महारानी कैकेयी कोपभवन में गई हैं। चिन्तित महाराज ने कोपभवन में जाक瓥र देखा कि उनकी प्राणेश्‍वरी मलिन वस्त्र धारण किये, केश बिखराये, भूमि पर अस्त-व्यस्त पड़ी है। कैकेयी को इस अवस्था में देखकर आश्‍चर्यचकित हो राजा दशरथ ने कहा, "प्राणप्रिये! मुझसे ऐसा क्या कार्य हुआ है जिससे क्रुद्ध होकर तुम्हें कोपभवन में आना पड़ा? यदि तुम्हें किसी प्रकार का दुःख हुआ है तो मुझे बताओ। मैं उसका निवारण अवश्य करूँगा।"

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महाराज को इस प्रकार मनुहार करते देखकर कैकेयी बोलीं, "प्रणनाथ! मैं अपनी एक अभिलाषा को पूर्ण होते देखना चाहती हूँ। किन्तु मैं उसे तभी आपसे कहूँगी यदि आप उसे पूरी करने की शपथपूर्वक प्रतिज्ञा करेंगे।" कैकेयी के वचन सुनकर महाराज दशरथ ने मुस्कुराते हुये क瓥61;ा, "केवल इतनी सी बात है जिसके लिये तुम कोपभवन में चली आईं हो? मुझे बताओ, तुम्हारी क्या अभिलाषा है। मैं तत्काल उसे पूरा करता हूँ।" कैकेयी बोली, "महाराज! पहले आप सौगन्ध लीजिये कि आप मेरी अभिलाषा अवश्य पूरी करेंगे।" इस पर महाराजा दशरथ ने कहा, "हे प्राणवल्लभे! तुम तो जानती ही हो कि इस संसार में मुझे राम से अधिक प्रिय और कोई नहीँ है। मैं उसी राम की सौगन्ध लेकर वचन देता हूँ कि तुम्हारी जो भी मनोकामना होगी, उसे मैं तत्काल पूरी करूँगा।। अब तुम मुझे अपनी अभिलाषा बताओ।

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आश्‍वस्त होकर कैकेयी बोली, "आपको स्मरण होगा कि देवासुर संग्राम के समय आपके मूर्छित हो जाने पर मैंने आपकी रक्षा की थी। इससे प्रसन्न होकर आपने मुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी। उन दोनों वरों क瓥9; मैं आज माँगना चाहती हूँ। पहला वर तो मुझे यह दें कि आप राम के स्थान पर मेरे पुत्र भरत का राजतिलक करें और दूसरा वर मैं यह माँगती हूँ कि राम को चौदह वर्ष के लिये वन जाने की आज्ञा दें। मेरी इच्छा है कि आज ही राम वल्कल पहनकर वनवासियों की भाँति वन के लिये प्रस्थान करे। अब आप अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें क्योंकि आप सूर्यवंशी हैं और सूर्यवंश में अपनी प्रतिज्ञा का पालन प्राणों की बलि देकर भी किया जाता है।"

कैकेयी के मुख से निकले हुये इन वचनों को सुनकर राजा दशरथ का हृदय चूर-चूर हो गया। वे असह्य पीड़ा को न सह सके तथा मूर्छित होकर गिर पड़े। कुछ समय के बाद जब उनकी मूर्छा भंग हुई तो वे क्रोध और वेदना से काँपते हुये बोले, "हे कुलघातिनी! न जाने मुझसे ऐसा कौन सा अपराध अपराध हुआ है जिसका तूने इतना भयंकर प्रतिशोध लिया है। नीच! पतिते瓥 राम की श्रद्‍धा तो तुझ पर कौशल्या से भी अधिक है। फिर भी तू उसका जीवन नष्ट करने के लिये कटिबद्ध हो गई है। प्रजा के अत्यन्त प्यारे राम को बिना किसी अपराध के मैं भला कैसे निर्वासित कर सकता हूँ? तुझे अच्छी तरह से ज्ञात है कि मैं अपने प्राण त्याग सकता हूँ किन्तु राम का वियोग नहीं सह सकता। मेरी तुझसे विनती है कि राम के वनवास की बात के बदले तू कुछ और माँग ले। मैं तुझे विश्‍वास दिलाता हूँ कि मैं तेरी माँग अवश्य पूरी करूँगा।"

उनके इन दीन वचनों को सुनकर भी कैकेयी द्रवित नहीं हुई। वह बोली, "राजन्! ऐसा कहकर आप अपने वचन से हटना चाहते हैं। यह आपको शोभा नहीं देता। आप सूर्यवंशी हैं, अपनी प्रतिज्ञा पूरी कीजिये। प्रतिज्ञा से हटकर स्वयं को और सूर्यवंश को कलंकित मत कीजिये। यदि आपने अपना वचन नहीं निभाया तो मैं तत्काल आपके सम瓥#2381;मुख ही विष पीकर अपने प्राण त्याग दूँगी। ऐसा होने पर आप केवल प्रतिज्ञा भंग करने के साथ ही साथ स्त्री-हत्या के भी दोषी हो जायेंगे। अतः उचित यही है कि आप अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें।"

राजा दशरथ के अनेकों बार मूर्छित होते-होते तथा मूर्छा समाप्ति होने पर कातर भाव से कैकेयी को मनाने का प्रयत्न करते-करते पूरी रात बीत गई। आकाश में उषा की लालिमा फैलने लगी जिसे देखकर कैकेयी ने उग्ररूप धारण कर लिया और कहा, "राजन्! आप व्यर्थ ही समय व्यतीत कर रहे हैं। उचित यही है कि आप तत्काल राम को वन जाने की आज्ञा दीजिये और भरत के राजतिलक की घोषणा करवाइये।"

उधर सूर्योदय होने पर गुरु वशिष्ठ मन्त्रियों के साथ राजप्रासाद के द्वार पर पहुँचे और महामन्त्री सुमन्त को महाराज के पास जाकर अपने आगमन की सूचना देने के लिये कहा। कैकेयी एवं द&瓥2358;रथ के सम्वाद से अनजान सुमन्त ने महाराज के पास जाकर कहा, "हे राजाधिराज! रात्रि का समापन हो गया है और गुरु वशिष्ठ का आगमन भी हो चुका है। अतएव आप शैया त्याग कर गुरु वशिष्ठ के पास चलिये।" सुमन्त के वचन सुनकर महाराज दशरथ को फिर से असह्य वेदना का अनुभव हुआ तथा वे फिर से मूर्छित हो गये। उनके इस प्रकार मूर्छित होने पर कुटिल कैकेयी बोली, "हे महामन्त्री! अपने प्रिय पुत्र के राज्याभिषेक के उल्लास के कारण महाराज रात भर सो नहीं सके हैं। उन्हें अभी-अभी ही तन्द्रा आई है। महाराज निद्रा से जागते ही राम को कुछ आवश्यक निर्देश देना चाहते हैं। तुम शीघ्र जाकर राम को यहीं बुला लाओ।"

कैकेयी के आदेश को सुनकर सुमन्त रामचन्द्र को उनके महल से बुला लाये।

आगे की कथा - राम का वनवास

Valmiki Ramayn is a great Hindu epic created by Maharshi Valmiki in Sanskrit language. Maharshi Valmiki describes the holly character or Lord Rama in Valmiki Ramayan. Lord Rama is treated as a person by Manarshi Valmiki where as in the epic Ramcharitmanas Saint Tulsidas treats him as an incarnation of Lord Vishnu.

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