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बालकाण्ड
वाल्मीकि रामायण Valmiki Ramayan
अयोध्याकाण्ड

राजतिलक की तैयारी
दूसरे दिन राजा दशरथ ने अपना दरबार लगाया जिसमें सभी देशों के राजा लोग उपस्थित थे। उन्हें सम्बोधत करते हुये दशरथ ने कहा, "हे राजागण! मैं आप सबका अपनी और अयोध्यावासियों की ओर से हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह तो आपको ज्ञात ही है कि इस अयोध्या पर कई पीढ़ियों से इक्ष्वाकु वंश का शासन चलता आ रहा है। इस परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये इसका शासन-भार मैं अपने सब प्रकार से योग्य, वीर, पराक्रमी, मेधावी, धर्मपरायण और नीतिनिपुण ज्येष्ठ पुत्र राम को सौंपना चाहता हूँ। मैंने अपनी प्रजा को सब प्रकार से सुखी और सम्पन्न बनाने का प्रयास किया है। अब वृद्ध होने के कारण मैं प्रजा के कल्याण के लिये अधिक सक्रिय रूप से कार्य करने में असमर्थ हूँ और मुझे विश्वास है कि राम अपने कौशल और सूझ-बूझ से प्रजा को मुझसे भी अधिक सुखी रख सकेगा। इस विचार को कार्यान्वित करने के लिये मैंने राज्य के ब्राह्मणों, विद्वानों एवं नीतिज्ञों से अनुमति ले ली है। वे सब सहमत हैं कि राम शत्रुओं के आक्रमणों से भी देश की रक्षा करने में सक्षम है। उसमें राजत्व के सभी गुण विद्यमान हैं। उनकी दृष्टि में राम अयोध्या का ही नहीं, तीनों लोकों का राजा होने की भी योग्यता रखता है। इस राज्य के लिये आप लोगों की सम्मति का भी महत्व कम नहीं है अतः मैं आप लोगों की सम्मति जानना चाहता हूँ।" इस पर वहाँ पर उपस्थित सभी राजाओं ने प्रसन्नता पूर्वक राम के राजतिलक के लिये अपनी सम्मति दे दी।
राजा दशरथ ने कहा, "आप लोगों की सम्मति पाकर मैं अत्यंत प्रसन्न हुआ हूँ। मेरा विचार है कि इस चैत मास - जो सब मासों में श्रेष्ठ मधुमास कहलाता है - में कल ही राम के राजतिलक के उत्सव का आयोजन किया जाय। मैं मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी से प्रार्थना करूँगा कि वे राम के राजतिलक की तैयारी का प्रबन्ध करें।" राजा दशरथ का निर्देश पाकर राजगुरु वशिष्ठ जी ने सम्बंधित अधिकारियों को आज्ञ दी कि वे यथाशीघ्र स्वर्ण, रजत, उज्वल माणिक्य, सुगन्धित औषधियों, श्वेत सुगन्धियुक्त मालाओं, लाजा, घृत, मधु, उत्तम वस्त्रादि एकत्रित करने का प्रबन्ध करें। चतुरंगिणी सेना को सुसज्जित रहने का आदेश दें। स्वर्ण हौदों से सजे हुये हाथियों, श्वेत चँवरों, सूर्य का प्रतीक अंकित ध्वजाओं और परम्परा से चले आने वाले श्वेत निर्मल क्षत्र, स्वर्ण निर्मित सौ घोड़े, स्वर्ण मण्डित सींगों वाले साँड सिंह की अक्षुण्ण त्वचा आदि का शीघ्र प्रबन्ध करें। सुसज्जित वेदी का निर्माण करें। इस प्रकार के जितने भी आवश्यक निर्देश थे, वे उन्होंने सम्बंधित अधिकारियों को दिये।
इसके पश्चात् राजा दशरथ ने प्रधानमन्त्री सुमन्त से कहा, "आप जाकर राम को शीघ्र लिवा लाइये।" आज्ञा पाते ही सुमन्त रामचन्द्र जी को रथ में अपने साथ बिठा कर लिवा लाये। राम ने बड़ी श्रद्धा के साथ पिता को प्रणाम किया और उपस्थित जनों का यथोचित अभिवादन किया। राजा दशरथ ने राम को अपने निकट बिठाकर मुस्कुराते हुये कहा, "हे राम! तुमने अपने गुणों से समस्त प्रजाजनों को प्रसन्न कर लिया है। इसलिये मैंने निश्चय किया है किस मैं कल तुम्हारा राजतिलक दर दूँगा। इस विषय में मैंने ब्राह्मणों, मन्त्रियों, विद्वानों एवं समस्त राजा-महाराजाओं की भी सम्मति प्राप्त कर लिया है। इस अवसर पर मैं तम्हें अपने अनुभव से प्राप्त कुछ बातें बताना चाहता हूँ। सबसे पहली बात तो यह है कि तुम कभी विनयशीलता का त्याग मत करना। इन्द्रियों को सदा अपने वश में रखना। अपने मन्त्रियों के हृदय में उठने वाले विचारों को प्रत्यक्ष रूप से जानने और समझने का प्रयास करना। प्रजा को सदैव सन्तुष्ट और सुखी रखने का प्रयास करना। यदि मेरी कही इन बातों का तुम अनुसरण करोगे तो तुम सब प्रकार की विपत्तियों से सुरक्षित रहोगे और लोकप्रियता अर्जित करते हुये निष्कंटक राजकाज चला सकोगे। यह सिद्धांत की बात है कि जो राजा अपनी प्रजा को प्रसन्न और सुखी रखने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहता है, उसका संसार में कोई शत्रु नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति स्वार्थवश उसका अनिष्ट करना भी चाहे तो भी वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता क्योंकि ऐसे राजा को अपनी प्रजा एवं मित्रों का हार्दिक समर्थन प्राप्त होता है।"
पिता से यह उपयोगी शिक्षा प्राप्त करके राम ने स्वयं को धन्य माना और उन्होंने अपने पिता को आश्वासन दिया कि वे अक्षरशः इन बातों का पालन करेंगे। उधर दास-दासियों.राजा के मुख से राम का राजतिलक करने की बात सुनी तो वे प्रसन्नता से उछलते हुये महारानी कौशल्या के पास जाकर उन्हें यह शुभ संवाद सुनाया जिसे सुनकर उनका रोम-रोम पुलकित हो गया। इस शुभ समाचार के सुनाने वालों को उन्होंने बहुत सा स्वर्ण, वस्त्राभूषण देकर मालामाल कर दिया।
आगे की कथा - कैकेयी कोपभवन में
Valmiki Ramayn is a great Hindu epic created by Maharshi Valmiki in Sanskrit language. Maharshi Valmiki describes the holly character or Lord Rama in Valmiki Ramayan. Lord Rama is treated as a person by Manarshi Valmiki where as in the epic Ramcharitmanas Saint Tulsidas treats him as an incarnation of Lord Vishnu.
वाल्मीकि रामायण - अयोध्याकाण्ड - राजतिलक की तैयारी valmiki ramayan
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राजतिलक की तैयारी
दूसरे दिन राजा दशरथ ने अपना दरबार लगाया जिसमें सभी देशों के राजा लोग उपस्थित थे। उन्हें सम्बोधत करते हुये दशरथ ने कहा, "हे राजागण! मैं आप सबका अपनी और अयोध्यावासियों की ओर से हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह तो आपको ज्ञात ही है कि इस अयोध्या पर कई पीढ़ियों से इक्ष्वाकु वंश का शासन चलता आ रहा है। इस परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये इसका शासन-भार मैं अपने सब प्रकार से योग्य, वीर, पराक्रमी, मेधावी, धर्मपरायण और नीतिनिपुण ज्येष्ठ पुत्र राम को सौंपना चाहता हूँ। मैंने अपनी प्रजा को सब प्रकार से सुखी और सम्पन्न बनाने का प्रयास किया है। अब वृद्ध होने के कारण मैं प्रजा के कल्याण के लिये अधिक सक्रिय रूप से कार्य करने में असमर्थ हूँ और मुझे विश्वास है कि राम अपने कौशल और सूझ-बूझ से प्रजा को मुझसे भी अधिक सुखी रख सकेगा। इस विचार को कार्यान्वित करने के लिये मैंने राज्य के ब्राह्मणों, विद्वानों एवं नीतिज्ञों से अनुमति ले ली है। वे सब सहमत हैं कि राम शत्रुओं के आक्रमणों से भी देश की रक्षा करने में सक्षम है। उसमें राजत्व के सभी गुण विद्यमान हैं। उनकी दृष्टि में राम अयोध्या का ही नहीं, तीनों लोकों का राजा होने की भी योग्यता रखता है। इस राज्य के लिये आप लोगों की सम्मति का भी महत्व कम नहीं है अतः मैं आप लोगों की सम्मति जानना चाहता हूँ।" इस पर वहाँ पर उपस्थित सभी राजाओं ने प्रसन्नता पूर्वक राम के राजतिलक के लिये अपनी सम्मति दे दी।
राजा दशरथ ने कहा, "आप लोगों की सम्मति पाकर मैं अत्यंत प्रसन्न हुआ हूँ। मेरा विचार है कि इस चैत मास - जो सब मासों में श्रेष्ठ मधुमास कहलाता है - में कल ही राम के राजतिलक के उत्सव का आयोजन किया जाय। मैं मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी से प्रार्थना करूँगा कि वे राम के राजतिलक की तैयारी का प्रबन्ध करें।" राजा दशरथ का निर्देश पाकर राजगुरु वशिष्ठ जी ने सम्बंधित अधिकारियों को आज्ञ दी कि वे यथाशीघ्र स्वर्ण, रजत, उज्वल माणिक्य, सुगन्धित औषधियों, श्वेत सुगन्धियुक्त मालाओं, लाजा, घृत, मधु, उत्तम वस्त्रादि एकत्रित करने का प्रबन्ध करें। चतुरंगिणी सेना को सुसज्जित रहने का आदेश दें। स्वर्ण हौदों से सजे हुये हाथियों, श्वेत चँवरों, सूर्य का प्रतीक अंकित ध्वजाओं और परम्परा से चले आने वाले श्वेत निर्मल क्षत्र, स्वर्ण निर्मित सौ घोड़े, स्वर्ण मण्डित सींगों वाले साँड सिंह की अक्षुण्ण त्वचा आदि का शीघ्र प्रबन्ध करें। सुसज्जित वेदी का निर्माण करें। इस प्रकार के जितने भी आवश्यक निर्देश थे, वे उन्होंने सम्बंधित अधिकारियों को दिये।
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